भारत में 24 मार्च 2020 को COVID-19 से लड़ने के लिए एक देशव्यापी लॉकडॉउन लगाया गया जिसको 4 चरणों के माध्यम से 31 मई 2020 तक बड़ा दिया गया है। लॉकडाउन के तीसरे चरण में 13 मई 2020 को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद मोदी जी ने  देश की जनता संबोधित किया और देश की आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने के लिए 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी। आर्थिक पैकेज का विस्तार से वर्णन वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण और वित्त राज्य मंत्री श्री अनुराग ठाकुर द्वारा 5 दिनों में किया गया। सरकार आर्थिक पैकेज के माध्यम से सभी वर्गों के लोगों की सहायता करने की कोशिश की है। इसमें  प्रवासी मजदूरों के लिए भी कुछ सहायता की घोषणा हुई।

कौन है ये प्रवासी मजदूर-

देश आर्थिक गतिविधि रुक जाने के कारण देश का एक बड़ा तबका सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। यह वह तबका है जो आपक शहर के किसी भी नुक्कड़, चौराहे पर काम करता हुआ या फिर देश के सड़क, बीज या आदि निर्माण कार्य में काम करता हुआ दिख जाएगा। यह अन ऑर्गेनाइज सेक्टर के वह मजदूर है जिसके पास में न तो कोई महीने फिक्स वेतन है और ना ही कोई सेविंग इन्हें प्रतिदिन के वेतन पर काम पर रखा जाता है इनमें से बहुतों के पास रहने के लिए किराए का घर भी नहीं होता है अगर काम रुक जाए तो आजीविका चलाना मुश्किल हो जाता है।बहुत से मजदूर ऐसे भी होते हैं जो न पढ़े-लिखे हैं और न ही उनके पास आज की डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध है जिससे कि वह समझ सके की सरकार उनकी सहायता के लिए क्या कर रही हैं। सरकार की स्कीम और इन मजदूरों के बीच बहुत बड़ा कम्युनिकेशन गैप देखने को मिलता है।

लॉकडॉउन जैसे ही शुरू हुआ इन मजदूरों के सामने आर्थिक संकट आ गया। इन मजदूरों को जब अगले हफ्ते के राशन और अगले महीने के किराया का कोई ठिकाना नहीं दिखा तो इनके कदम अपने घर की ओर निकल पड़े । लॉकडॉउन के दूसरे ही दिन से इन प्रवासी मजदूरों का पलायन शुरू हो गया था। कई शहरों के बॉर्डर पर लाखों की संख्या में मजदूर इकट्ठा हो गए थे। उस समय सरकार के सामने बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई थी फिर प्रशासन की सहायता से इन मजदूरों को बसों के माध्यम से उनके घर पहुंचाया।
अप्रैल महीने के बीतते ही ऐसे दृश्य आने लगे जब प्रवासी मजदूर अपने घरों के लिए पैदल ही सड़क पर निकल गए। हजारों हजारों किलोमीटर की लंबी यात्रा ये मजदूर साइकिल से या फिर पैदल करते हुए दिखे। कई जगह से ऐसे भी दृश्य आए जो वाकई में बहुत भयावह थे मजदूर ट्रक के कंटेरा में अपनी जान को जोखिम में डालकर आते हुए दिखे। बहुत से मजदूर ट्रेन की पटरी ऊपर पैदल चलते हुए । इस COVID-19 के महामारी में  बिना social distancing के एक ही ट्रकों 100 100 मजदूर अपनी जान की परवाह किए बिना अपने घर जाने के लिए निकल रहे हैं। एक मामला ऐसा भी सामने आया था जब सीमेंट मिक्सिंग मशीन के अंदर से 18 मजदूरों को  पुलिस एक चेक पोस्ट पर बाहर निकली।ऐसी बहुत सारी दुखद घटनाएं भी देखने को मिला है जिसमें प्रवासी मजदूरो की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई हो। पिछले 1 महीने में लगभग 150 से अधिक मजदूर सड़क दुर्घटना के शिकार हुए हैं।

सरकार के उठाए गए कदम-


  • ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि सरकार ने पिछले 2 महीनों में इन प्रवासी मजदूरों के लिए कुछ ना किया।केन्द्र सरकार ने  मार्च महीने के अंत में सभी राज्य सरकारों से कह दिया था की आप "स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड" से पैसे निकाल कर इन प्रवासी मजदूरों को आश्रय गृह और भोजन की सुविधा प्रदान करे।कई राज्य आश्रय गृह आज भी चल रहे हैं 
  •  केंद्र सरकार सभी राज्यों के 11002 करोड़ "स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड" और प्रदान किये जिससे राज्य सरकार शहरी बेघर लोगो 3 टाइम का साफ भोजन प्रदान करे 
  • 7200 नए स्वम समूह शहरी गरीबो के लिए बनाये गए 
इसके बाद भी प्रवासी मजदूरों का पलायन नहीं रुका तो राज्यों के अनरोध के बाद केंद्र सरकार ने लॉकडॉउन के तीसरे चरण में "श्रमिक स्पेशल" ट्रेनें चलाने की घोषणा की थी ताजा आंकड़ों के मुताबिक 19 मई 2020 तक  भारतीय रेलवे 19 दिन में  1600 से अधिक "श्रमिक स्पेशल" ट्रेनों के जरिये कुल 21.5 लाख से अधिक प्रवासियों को उनके गृह राज्यों तक पहुंचा चुकी है।
सरकार के इन सभी व्यवस्थाओं के बावजूद प्रवासी मजदूरों का पलायन अभी भी देखने को मिल रहा है मजदूरों का कहना है कि उनके पास कोई जानकारी नहीं है कि ट्रेन चल रही है इन सब को देखते हुए, एहसास होता है कि सरकार की स्कीमों और इन मजदूरों के बीच बहुत बड़ा कम्युनिकेशन गैप है।



आर्थिक पैकेज में प्रवासी मजदूरों के लिए क्या विशेष है-

  1. केंद्र सरकार द्वारा 2 महीने तक इन प्रवासी मजदूरों को मुफ्त में राशन प्रदान कराया जाए गा। चाहे वह NFSA में रजिस्टर्ड हो या ना हो। राज्य सरकारों की जिम्मेदारी होगी कि वह प्रवासी मजदूरों की पहचान करें। सरकार को उम्मीद है कि इससे  8 करोड़ लोगों को फायदा होगा।
  2. वन नेशन वन राशन कार्ड लागू करने की बात कही गई हैं। सरकार का कहना है कि अगस्त 2020 तक 83% और मार्च 2021 तक 100% डेटा  पूर्ण कर दिया जाएगा।जिससे भविष्य में कोई भी अपमा राशन किसी भी राज्य से ले सके गा 
  3. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक ही स्किन के माध्यम से प्रवासी मजदूरों को किराए का घर प्रदान किया जाएगा। इन घरों का निर्माण के उन कंपनियों जिसमें मजदूर काम कर रहे है 
  4. केंद्र सरकार ने मनरेगा में आवंटित राशि को 40 हजार करोड़ रूपया बढ़ा दिया है। सरकार का मानना है कि प्रवासी मजदूरों उनके गृह राज्य में ही मानेगा के तहद नौकरी मिल जाएगी। मई महीने में मनरेगा 40 से 50 % मानांकन बड़ गया है ।
उम्मीद है कि इस आर्थिक पैकेज प्रवासी मजदूरों को कुछ संभल जरूर मिलेगा परंतु बहुत से अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मनरेगा स्कीम को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के सरकार के फैसले पर मजदूरों को दूरगामी लाभ जरूर मिलेगा लेकिन वर्तमान परिस्थिति के अनुसार प्रावासी मजदूरों को कोई लाभ मिलता हुआ नहीं दिख रहा है। सरकार के किसी भी स्कीम को प्रभावी होने में कुछ समय तो जरूर लगेगा चाहे वह वन नेशन वन राशन कार्ड के डाटा को पूरा करना हो या फिर आवास योजना के तहत मकान बना कर प्रवासी मजदूरों को किराए का मकान प्रदान करना हो। यह आर्थिक पैकेज प्रवासी मजदूरों के लिए ठीक उसी प्रकार है जैसे कि कोई मरीज अभी बीमार है और उसे दवा के बदले विटामिन की गोली दी जा रही हो।

प्रवासी मजदूरों की समस्या का मुख्य कारण यह भी है कि सरकार के पास इन मजदूरों की संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। जिसको ध्यान में रखें सरकार कोई योजना बनाए।" National sample survey office" ने 2017 में Vulnerable job की श्रेणी में काम कर रहे मजदूरों का Periodic labour force survey कराया गया  था इस छोटे से सर्वे में भी लगभग1.5 करोड़ मजदूरों की संख्या मिली थी। सरकार को Monitoring portal विकसित करना होगा जिससे सरकार को पता लग सके की कितने मजदूर अपने शहर को छोड़कर दूसरे शहर में काम करने जा रहे हैं। राज्य सरकारों को भी सोचना होगा कि कोई ऐसा तरीका निकाले मजदूरों को गृह राज्य में ही नौकरी मिल सके।


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